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परोपकार का आनंद निराला । Short Hindi Story of Benjamin Franklin

परोपकार का आनंद निराला । Short Hindi Story of Benjamin Franklin

परोपकार का आनंद निराला । Short Hindi Story of Benjamin Franklin

परोपकार का आनंद निराला । Short Hindi Story of Benjamin Franklin

बेंजामिन फ्रेंकलिन ने अपने एक धनवान मित्र की मेज पर सोने की कुछ गिन्नियां रखी और उससे

कहा- भाई यह लीजिये आपकी रकम वापस हुयी। धनवान मित्र अचंभित हो गया उसने पूंछा-यह

क्या है ?

 

एकबार मैंने आपसे कुछ गिन्नियां, रकम के तौर पर आपसे ली थी। बस वही वापस कर रहा हूँ और क्या

धनी मित्र को तो अब कुछ भी याद नहीं था। तब फ्रेंकलिन ने बताया कि – मैंने आपके दिये हुये पैसे से

एक प्रेस से समाचार- पत्र छापने का काम प्रारंभ किया था।

 

अचानक मेरे स्वास्थ्य में खराबी आ जाने के कारण मेरा काम सब ठप हो गया और उसी समय मैंने

आपसे यह रकम ली थी।  अब वह राशि मैं आपको लौटाने आया हूँ। आपने समय पर जो सहायता

की उसके लिये आपको बहुत-बहुत धन्यवाद ।

 

उसी का परिणाम ही है कि अखबार दुबारा प्रकाशित हो रहा है। अखवार की प्रसार संख्या में भी

बृद्धि हुयी है। आर्थिक दृष्टि  से अब मैं पूरी तरह निशचिंत हूँ। मुझे पैसे सम्बन्धी कोई परेशानी नहीं है।

अब मैं इस लायक हूँ कि मैं आपकी गिन्निया आपको दे सकूँ ।

                                                                                Charity Hindi story

बेंजामिन ने विस्तार से स्थिति स्पष्ट की, तो उसको सब याद आ गया और उसने कहा यह तो ठीक है

कि आप मुझसे राशि ले गये थे, पर उसे वापस लौटने की कोई बात तो तय ही नहीं हुयी थी। आप

उस समय कठिनाई में थे, तो आपकी सहायता करना मेरा फर्ज़ था।

 

इसीलिए मैंने  उस समय अपने कर्तव्य का पालन किया। जब फ्रेंकलिन ने जोर दिया, तो उनके

मित्र ने कहा- मेरी और से आप यह रकम अपने पास रखे और जब कोई कभी व्यक्ति कष्ट में आपके

पास आये तो आप यह रकम उसे दे देना।

 

आप भी कभी उससे वापस नहीं लेना और वह भी किसी को इस रकम को किसी की सहायता के लिये

दे देगा, इसतरह यह हमारा क्रम चलता रहेगा तो सोचो कितना अच्छा होगा। यह सब सुनकर, कुछ

सोचकर फ्रेंकलिन ने वे गिन्नियां अपने पास रख ली और वैसा ही किया, जैसा उसके मित्र ने उसको

कहा था।

 

वे समझ गये कि जीवन में आनंद की अनुभूति केवल मानवीय संवेदनाओं से होती है। गिन्नियां अगर

वापस रख ली जाती तो वे वैसा आनंद नहीं दे पाती, जैसा ज़रुरतमंदों की जरुरत पूरी करते हुये देंगी।

 

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमेशा सहायता करते रहने चाहिए पर ये सहायता हमें

निर्मल मन से करना चाहिए न कि फल की चिंता करनी चाहिये।

 

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