Hindi Story on Foodie Habit अपनी जीभ के गुलाम न बने

Hindi Story on Foodie Habit अपनी जीभ के गुलाम न बने

Hindi Story on Foodie Habit अपनी जीभ के गुलाम न बने

Hindi Story on Foodie Habit अपनी जीभ के गुलाम न बने

बहुत पुरानी बात हे एक प्रसिद्ध समाज सुधारक थे। जिसका नाम महादेव गोविन्द रानाडे था बात उन दिनों की है, जब रानाडे बम्बई में रहते थे। जिसे आज हम मुंबई कहते हैं। उनके पड़ोस  में एक महिला रहती थी। वह एक सम्पन घराने में महिला रहती थी।

वो कहते हे भाग्य का खेल भी अजीब होता है।  पल भर में राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है। उस महिला का भाग्य चक्र भी ऐसा घूमा, वह अब पहले की तरह सम्पन नहीं रही। उसके पास पहले की तरह धन नहीं रहा।

उस महिला को सिर्फ इतनी ही आय होती थी कि वह  अपना और अपने एकलौते बेटे का पेट भर सके वह महिला अपने पुराने दिनों को
याद करके दुखी होती रहती थी और रोती रहती थी।

रानाडे हमेशा उसे दुखी और रोता हुआ देखते थे।

एक दिन उन्होंने उस महिला से उनके दुःख का कारण पूछा-

महिला ने उसे अपने पुराने दिनों के ऐश्वर्य के बारे में बताया वह बोली- “हमारे पास किसी भी चीज की कमी नहीं थी। मेरे दुःख का वास्तविक कारण मेरी जीभ का चटोरापन है। पहले हमारे घर में कई प्रकार के व्यंजन बनते थे। मेरी खाने की आदत इतनी बढ़ गई कि उस वजह से मेरा स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा मगर मैंने खाना नहीं छोड़ा।  मैं बीमार रहने लगी कई तरह की दवाइयां भी मुझे लेनी पड़ती थी”

“मगर अब तो दो वक्त  का खाना ही मिल पाता है, कई प्रकार के व्यंजन मिल पाना तो नामुमकिन हे अब मुझे दवाइयों की जरुरत नहीं पड़ती है  लेकिन मेरी जीभ नहीं मानती। “

मैं अपने मन को बहुत समझाती हूँ कि अब उन व्यंजनों को याद करना व्यर्थ है। मगर मेरी जीभ मेरे वश में नहीं है. मेरा बेटा तो रुखी सूखी से  पेट भर लेता है और खुश रहता है। मगर मुझे ऐसा खाना खाने की आदत नहीं है और मैं अपना पेट नहीं भर पाती और दुखी रहती हूँ।

उसी पल रानाडे ने तय कर लिया। कभी भी अपनी जीभ का गुलाम नहीं बनेंगे। जो चीज़ें ज्यादा पसंद है।उन्हें भी खायेंगे और नापसंद हैं। उन्हें भी प्रेम से खायेंगे और सीमित  मात्रा खायेंगे। इस नियम का उन्होंने आजीवन पालन किया।

 

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