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गृहस्थ ही सच्चा वैराग्य है Motivational Hindi Story on quietness

गृहस्थ ही सच्चा वैराग्य है

Motivational Hindi Story on quietness

गृहस्थ ही सच्चा वैराग्य है Motivational Hindi Story on quietness

गृहस्थ ही सच्चा वैराग्य है Motivational Hindi Story on quietness

एक बार की बात है एक युवक अपना घर छोड़कर एक धार्मिक नगर में जा पहुंचा !

वहां वह एक प्रसिद्ध संत से मिला और उनसे बोला महंत जी यह सांसारिक जीवन बड़ा व्यर्थ है। आप मुझे कृपा करके गुरुदीक्षा दे दिजिए एवं मुझे वैरागी बना दीजिए।

फिर उस  संत ने उस युवक से कुछ सवाल पूछे और कहा – हे युवक अच्छा ये बताओ कि तुम्हारा मकान जहां तुम रहते हो वह कच्चा है या फिर पक्का है ?

तुम्हारे परिवार में तुम्हारे साथ कितने लोग रहते है ?

और तुम्हारे घर का भोजन कैसा बनता है?यह सारे सवाल  उस युवक के लिए बड़े ही आश्चर्यजनक थे।

यह सारे प्रश्नों को सुनकर युवक हैरान हो गया।

उसने सोचा कि शायद महंत जी उसकी परीक्षा ले रहे हैं। फिर युवक ने उन प्रश्नो का उत्तर दिया – ‘महाराज, मैं जिस गाँव में रहता हूं वहाँ मेरा मकान बहुत कच्चा है मेरे परिवार में चार लोग है तथा हम साधारण रोटी खाकर ही पेट भरते है परंतु संसाररूपी कार्यो में मेरा मन ही नहीं लगता है।

फिर उस महंत ने युवक से कहा – हमारा मठ सुसज्जित शानदार महल जैसा है एवं यहां हजारो लोग रहते है। भंडारे में तरह तरह के पकवान एवं मिठाइयां मिलती है।

महंत जी बोले अगर कच्चे मकान को छोड़कर आश्रम में रहना ,परिवार के 4 सदस्यों को छोड़कर हजारों लोगों के साथ रहना, सादा दाल रोटी को छोड़कर भौजन में प्रतिदिन मिठाइयां,पकवान खाना ही तुम्हें वैराग्य लगता है.तो तुम्हें दीक्षा दे देता हूँ

जैसी तुम्हारी इच्छा। ,तुम मुझे बता दो ।

इन्सान का पहला धर्म अपने कर्तव्यों का पालन करना है. अपने कर्तव्यों से विमुख होकर वैराग्य लेना सही नहीं है

महंत जी के वचनों ने उस युवक की आंखे खोल दी ।उसने घर लौट जाने का निश्चय कर लिया । तब महंत ने   उसको समझाया-अगर इंसान चाहे तो घर में रहकर भी भगवान का भजन कर सकता है और सांसारिक वस्तुओं के बीच रहकर भी वैराग्य तक पहुंच सकता है।

सांसारिक जीवन जीने वाले गृहस्थ मनुष्य तो आलीशान आश्रम में रहने वाले साधु संतों से अधिक वैरागी होते है ।

तुम जाओ और जाकर समाज के कल्याण में लग जाओ ,क्यों कि इस काम को करने से ही तुम्हारा जीवन सार्थक होगा। इसके बाद महंत ने उसे आशीर्वाद दिया और अपने घर जाकर परोपकार के कार्य करने लगा। इस प्रकार वह सच्चा वैरागी बना।

गृहस्थ ही सच्चा वैराग्य होता है।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि कर्तव्यपालन ही सही मायनों में वैराग्य है. इंसान को सबसे पहले अपनी जम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए

 

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