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सुभाषचन्द्र बोस का सेवा भाव Short Hindi story on Subhash chandra bose

सुभाषचन्द्र बोस का सेवा भाव

Short Hindi story on Subhash chandra bose

सुभाषचन्द्र बोस का सेवा भाव Short Hindi story on Subhash chandra bose

सुभाषचन्द्र बोस का सेवा भाव Short Hindi story on Subhash chandra bose

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जिन्होंने देश की सेवा में अपना सारा जीवन न्यौछावर कर दिया। उनके जीवन में कई बार उन्होंने अपने परिवार से ज्यादा देश की सेवा को महत्व दिया। एक बार की बात है। बंगाल में भयंकर बाढ़ आई हुई थी। कई गांव डूब गए। लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो गया।

बात उस समय की है, जब नेता जी सुभाषचन्द्र बोस कॉलेज में पढ़ते थे। वे बाढ़ पीड़ितों की सेवा में जुटे हुए थे। वे कुछ लोगों का समूह बनाकर बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत सामग्री इकट्ठी करने में लगे थे।

उनके पिताजी एक दिन उनसे बोले- बेटा कहाँ जा रहे हो।

सुभाष बोले- पिताजी मैं बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिये जा रहा हूँ। मुझसे लोगों का दर्द बर्दाश्त नहीं होता। इस बाढ़ ने जबर्दस्त विनाश किया है।

पिताजी बोले- बेटा मैं तुम्हारी बात से पूरी सहमत हूँ। तुम्हें लोगों की सेवा अवश्य करनी चाहिए। लेकिन कुछ कर्तव्य घर के प्रति निभाना भी जरुरी है।

अपने गांव में माँ दुर्गा का अति विशाल पूजन किया जा रहा है। वहां तुम्हारा भी होना जरुरी है इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे साथ चलो।

पिताजी की बात सुनकर सुभाष बोले पिताजी क्षमा कीजिये, मैं आपके साथ नहीं चल सकता। यहाँ पर ऐसा तबाही का मंजर मैंने देखा है। ऐसे में मैं इन दीन- दुखियों को छोड़कर नहीं जा सकता। ऐसी मुश्किल परिस्थिति में अगर इंसान ही इंसान का साथ नहीं देगा, तो कोन किसकी मदद करेगा।

आप सब जाकर माँ दुर्गा की पूजा कीजिये मैं यहीं दीन दुखियों की सेवा करूँगा। उनकी सेवा करके मुझे माँ दुर्गा की पूजा का पुण्य यहीं प्राप्त हो जाएगा। घर के प्रति मेरे जो कर्तव्य हैं मैं अवश्य पूरे करूँगा। मगर इस वक़्त इन लोगों को मेरी आवश्यकता है।

बेटे की बात सुनकर पिता का सर गर्व से ऊँचा हो गया। उन्होंने सुभाष को गले लगा लिया और बोले बेटा दुर्गा माता की वास्तविक पूजा तो तुम्ही कर रहे हो। उन्होंने सुभाष को आशीर्वाद दिया और दुर्गा पूजा के लिए गांव चले गए।

तो ऐसे थे। हमारे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जिनकी देशभक्ति को आज भी लोग याद करते हैं। मानवता का एक सच्चा प्रमाण थे। हमें भी उनसे शिक्षा लेनी चाहिए और जरुरत के वक़्त निस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। यही सच्ची पूजा है।

 

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