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सखि वे मुझसे कहकर जाते । मैथलीशरण गुप्त । Sakhi ve mujhse keh kar jaate

सखि वे मुझसे कहकर जाते । मैथलीशरण गुप्त । 

Sakhi ve mujhse keh kar jaate

सखि वे मुझसे कहकर जाते । मैथलीशरण गुप्त । Sakhi ve mujhse keh kar jaate

सखि वे मुझसे कहकर जाते । मैथलीशरण गुप्त । Sakhi ve mujhse keh kar jaate

दोस्तों हम सभी ने ये कहानी सुनी है  कि गौतम बुद्ध एक बार ज्ञान प्राप्त करने के लिए रात्रि के समय अचानक अपना घर छोड़कर चले गए थे 

तब उनके घर वालों पे क्या बीती होगी । और साथ ही उनके घर में सबसे ज़्यादा उनपे जो निर्भर थीं  वो थीं उनकी पत्नी यशोधरा ।

उनपे क्या बीती होगी । अब सवाल ये उठता है कि यशोधरा क्या करे । तब यशोधरा की मनोदशा क्या रही होगी।

उन्होंने अपने आप को कैसे सम्भाला  होगा उसे क्या शिकायत रही होगी । उनके अंदर जो एक पीड़ा होगी उसका वर्णन 

मैथलीशरण गुप्त ने  अपनी एक कविता में किया है ।

मैथलीशरण गुप्त ने  अपनी एक कविता में किया है ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

               मुझको बहुत उन्होंने माना
               फिर भी क्या पूरा पहचाना?
               मैंने मुख्य उसी को जाना
               जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
               प्रियतम को, प्राणों के पण में,
               हमीं भेज देती हैं रण में –
               क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
               किसपर विफल गर्व अब जागा?
               जिसने अपनाया था, त्यागा;
               रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
               पर इनसे जो आँसू बहते,
               सदय हृदय वे कैसे सहते?
               गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
               दुखी न हों इस जन के दुख से,
               उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
               आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

               गये, लौट भी वे आवेंगे,
               कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
               रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
               पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

 

इस कविता का विडीओ देखने के लिए यहाँ Click करें ।

 

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सवाल तुम्हारे  पास भी हैं 

रात और चाँद 

न जाने क्या है इस खामोशी का सबब

कुछ नहीं कहना है कुछ नहीं सुनना है

तनहाँ सी ज़िंदगी

तुम भी क्या ख़ूब कमाल करते हो 

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मैंने चाहा था चलना आसमानों पे 

कविता लिखी नहीं जाती लिख जाती है 

अभी अभी तो उड़ान को पंख लगे हैं मेरी 

 

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