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राजा हरिश्चंद्र की कहानी | Raja Harischandra Story in Hindi

राजा हरिश्चंद्र की कहानी | Raja Harischandra Story in Hindi

राजा हरिश्चंद्र की कहानी | Raja Harischandra Story in Hindi

राजा हरिश्चंद्र की कहानी | Raja Harischandra Story in Hindi

पुराने समय में एक राजा थे | जिनका नाम था राजा हरिश्चंद्र वह महान दानी राजा थे |

उनके राज्य से कोई भी इंसान खाली हाथ नहीं जाता था |वे बहुत ही उपकारी, सत्यवादी,

दान देने में अग्रसर और त्याग करने में आगे थे |

उनकी पत्नी  का नाम तारामती व पुत्र का नाम रोहिताश्व था |

एक बार की बात है जब भगवान इंद्र  की प्रेरणा से एक मुनि  विश्वामित्र ने राजा

हरिश्चंद्र की दानशीलता और सत्यवादिता की परीक्षा लेने की बात सोची और इंद्र की कृपा से वे

राजा के सपने में आये और राजा से उनका पूरा राज्य मांग लिया | राजा भी दानी थे तो उन्होंने

भी बिना हिचकिचाये अपना पूरा राज्य दान में दे दिया |

दूसरे दिन की बात है सुबह -सुबह राजा के दरवार में महर्षि विश्वामित्र आये  और

उन्होंने राजा को एक दिन पहले का सपना याद दिलाया जिसमें राजा ने दान की बात भी की |

अब राजा को सब कुछ याद आ गया | राजा ने विश्वामित्र को पहचान लिया |

महर्षि ने राजा से दान माँगा और राजा ने अपने मंत्री को अपने राज्यकोष में धन लेने के लिये भेजा |

अचानक  महर्षि बोले ” जब तुमने कल रात सारा धन हमें दे दिया है तो हम यह तुम्हारा कैसे है ”

यह राज्य तो अब हमारा है | अब तुम कुछ भी दान दक्षिणा नहीं दे सकते हो|

राजा सोचने लगे कि विश्वामित्र सही कह रहे है | पर अब तो उनके राज्य में दान करने के लिये

कुछ भी नहीं है जिसे वे दान दे सके तो राजा ने सोचा कि अब दान देने के लिये मुझे स्वयं अपने

आप को बेचना होगा |

राजा को श्मशान  घाट का एक मालिक खरीदने के लिये तैयार हो गया |

उसके बेटे को और उसकी पत्नी को एक सुनार ने खरीद लिया |

राजा ने इसप्रकार जो धन प्राप्त  किया उससे राजा ने दान दिया |

राजा अपनी रानी और अपने पुत्र से भी अलग हो गये | तारामती पहले महारानी थी |

वह सुनार के घर में बरतन और चौका लगाने का काम करने लगी |

राजा श्मशान घाट पर पहरा देने का काम करने लगे |

जो भी लोग किसी का अन्तिम क्रियाकरम करने आते थे राजा उनसे कर लिया करते थे |

एक दिन की बात है उस दिन रोहिताश्व रोजाना की तरह बगीचे में फूल तोड़ने के लिये गया

वहां उसे एक सांप ने डस लिया | कुछ ही क्षणों में वह मर गया | तारामती इसकारण बहुत दुखी हुयी |

उसके पास इतने भी पैसे न थे कि वह अपने पुत्र का कफ़न ले सके | वह रोती हुयी अपने पुत्र को

श्मशान घाट पर ले गयी वहां  राजा हरिश्चंद्र ने अपने बेटे और पत्नी को पहचान लिया |

इस संकट की घड़ी में भी राजा अपना धैर्य बनाये रखे | उन्होंने तारामती से कर माँगा पर उसके पास पैसे नहीं थे |

राजा ने तारामती से कहा मैं अपने मालिक की आज्ञा के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता हूँ |

उन्होंने अपनी पत्नी से कहा तुम्हे पहले कर देना होगा कोई भी इस कर से मुक्त नहीं हो सकता है |

उन्होंने कहा कि अगर तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो अपनी साड़ी का कुछ भाग ही फाड़कर

मुझे दे दो मैं उसे कर के रूप में स्वीकार कर लूँगा |

विवश तारामती ने अपनी साड़ी फाड़ना शुरू कर दिया |

इस बीच विश्वामित्र और अन्य देवता प्रकट हो गये

विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से कहा कि तुम अपनी परीक्षा में पास हो गये हो |

तुमने दानशीलता और धर्मवादिता को बहुत अच्छे से पालन किया |

भगवान् ने सबसे पहले उसके पुत्र को जीवित किया और उनका पूरा राज्य भी उनको दे दिया |

इसतरह राजा हरिश्चंद्र अपनी दानशीलता  और धर्मवादिता के लिये अमर हो गये |

भारतेंदु जी ने राजा हरिश्चंद्र के विषय में कुछ लिखा है –

” आज भी  सत्य बोलने वाले हर व्यक्ति की तुलना राजा हरिश्चंद्र से की जाती है ”

कहते है –

“सत्य व धर्म का पालन कोई आसान काम नहीं होता है , जो इन दोनों का पालन लगन से करता

है तो वो लोग अमर हो जाता है, उन्हें सब याद रखते है | ऐसे ही राजा हरिश्चंद्र थे जिन्होंने हमेशा

अपने धर्म व सत्य का पालन किया और अमर हो गये ”

 

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