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कृष्ण जी के जन्म की कहानी । Motivational Hindi Story of lord Krishna

कृष्ण जी के जन्म की कहानी ।

Motivational Hindi Story of lord Krishna

कृष्ण जी के जन्म की कहानी । Motivational Hindi Story of lord Krishna

कृष्ण जी के जन्म की कहानी । Motivational Hindi Story of lord Krishna

उग्रसेन नामक एक राजा थे। जो कि मथुरा के राजा थे। वह बहुत दयालु थे।  उनके दो बच्चे थे।

कंस और देवकी। कंस अपनी बहन को बहुत चाहता था देवकी कंस की छोटी बहन थी। कंस

देवकी की हर एक चीज़ का ध्यान रखता था ।

 

जब देवकी बड़ी हुई तो उनके पिता ने उनके विवाह की बात कंस से कही तो कंस भी अपने पिता

की बात से सहमत हो गये। तब राजा ने उनके विवाह के लिए वासुदेव को चुना, जो कि उनके दरबार

में मंत्री थे।

 

बड़ी धूम-धाम से उनका विवाह कराया गया जैसे ही उनका विवाह संपन्न हो गया, तो कंस ने अपनी

बहन देवकी से कहा कि चल बहन आज मैं अपने रथ पर तुम्हे और तुम्हारे पति को घुमा कर लाता हूँ।

तो देवकी और वासुदेव दोनों उसके रथ पर बैठकर उसके साथ भ्रमण के लिये निकल पड़े।

 

कुछ दूर चलने के बाद अचानक एक बहुत तेज़ आवाज में आकाशवाणी हुई कि इन दोनों की आठवीं संतान

तुम्हारी मौत का कारण बनेगी, कंस बहुत ही अंधविश्वासी था। कंस ने जैसे ही यह सुना तो उसने

देवकी को अपने रथ से नीचे धकेल दिया।

 

तब वासुदेव कंस से देवकी को बचाने के लिये गिङगिङाने लगे और उन्होने कहा कि वे अपनी

संतान आपको सौप देंगें। कंस ने देवकी को बचा लिया। पर कंस ने उन दोनों को अपने महल में ही

बंदी बना लिया।

 

अब जब भी उन दोनों की कोई संतान होगी। तो कंस के सिपाही कंस को बता देते और कंस आकर उन्हें

मार डालता। इसी तरह उनकी छहः संतान को कंस ने मार डाला। जब उनकी सातवी संतान हुयी तो

उनको अपनी संतान को बचाने का एक मौका नज़र आया उस रात देवकी और वासुदेव ने अपनी

संतान को बचाने की ठान ली।

 

उस रात सिपाही सो गये और वासुदेव धीरे से वहां से निकलकर गये और अपनी दूसरी पत्नि के पास

अपने पुत्र को गोकुल छोड़ आये वह कोई और नहीं बलराम थे। कंस जानता था कि अब जो संतान पैदा होगी

वह उन दोनों की आठवी संतान होगी।

 

जो कि उसकी मृत्यु लेकर आयेगी। इस बार कंस कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहता था। उसने देवकी

और वासुदेव को लोहे की हथकड़ियों में कैद कर दिया। सावन मास में उनका आठवां पुत्र पैदा हुआ

उस दिन जैसे कोई जादू हुआ। उस दिन भारी वर्षा होने लगी।

 

भारी तूफ़ान आया था। अचानक वासुदेव के हाथ पैरों में बंधी लोहे की ज़ंजीर टूट गयी। दरवाजे अपने आप

खुल गये और सिपाही गहरी निद्रा में सो गये। इस बार भी उन्होंने अपने पुत्र को सुरक्षित करने के बारे में

पूरा विचार बना लिया और अपने पुत्र को अपने दोस्त नन्द के यहाँ छोड़ने का मन बना लिया।

 

वासुदेव ने अपने पुत्र को एक डलिया में रखा और डलिया अपने सिर पर रखी  और गोकुल की

ओर चल दिये। यमुना के उलटे तरफ गोकुल था। तूफ़ान बहुत तेज़ था ।इसीलिए वह चिंतित हो रहे

थे कि वह यह नदी कैसे पार करेंगे।उन्होंने नदी से प्रार्थना की कि हे देवी मुझे रास्ता दे।

 

यमुना नदी पहले तो बढ़ती गयी और जैसे ही उन्होंने श्री कृष्ण के चरण वंदन कर लिये तो वे शांत

हो गयी और वासुदेव आराम से आगे बढ़कर गोकुल पहुँच गये। वह अपने मित्र के यहाँ गये। वहां

उन्होंने देखा कि नन्द की पत्नी ने भी एक कन्या को जन्म दिया है।

 

उस समय नन्द और उनकी पत्नी सो रहे थे वासुदेव ने अपने पुत्र को रख दिया और उस कन्या को वहां

से उठा लिया वासुदेव ने सोचा कंस जब देखेगा यह लड़की है तो वह इसको नहीं मरेगा और वे यह

सोचकर मथुरा लौट गये वहां पहुंचकर उन्होंने ज़ल्दी से अपने आप को कैद में डाल लिया।

 

इससे पहले बच्चा रोता वे पहले जैसी स्थिति में आ गये अब वह कन्या रोई तो उसके रोने की आवाज़

सुनकर सिपाहियों की नींद खुल गयी। वह भागते- भागते गये और उन्नेहोंने  कंस को सुचना दी कि

आठवां पुत्र जन्म ले चुका है।

 

खबर सुनते ही कंस कारागृह में पहुंचा उस कन्या को लिया तो वासुदेव ने कंस से प्रार्थना की कि यह

तो एक कन्या है यह तुम्हे कोई नुकशान नहीं पंहुचा सकती है पर कंस बड़ा निर्दयी और अंधविश्वासी

था उसने उस कन्या को धरती पर जैसे ही फेका वह कन्या हवा में उड़ गयी और बोली –

तुम्हारी मृत्यु करने वाला इस दुनियां में पैदा हो चुका है और वह गोकुल में है इतना कह कर वह कन्या

गायब हो गयी। 

 

 

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