Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

कबीरदासजी का ईश्वर स्मरण Motivational Hindi story of Kabeerdas

कबीरदासजी  का ईश्वर स्मरण

कबीरदासजी का ईश्वर स्मरण Motivational Hindi story of Kabeerdas

कबीरदासजी का ईश्वर स्मरण Motivational Hindi story of Kabeerdas

Motivational Hindi story of Kabeerdas

बहुत पुरानी बात है। संत कबीर के दोहे जो कि हमेशा सच्चाई के रास्ते पर चलने की  प्रेरणा देते थे। वह सारा दिन कपड़ा बुनते रहते थे।  एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि आप सारा दिन कपड़ा बुनते रहते हैं,  तो भगवान का स्मरण कब करते हैं। आपको  भगवान्  का स्मरण करने के लिए तो वक़्त ही नहीं मिलता होगा।

इस पर कबीरदास जी ने कहा-

“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।”

अर्थ:- कबीर जी कहते है कि कुछ लोग वर्षों तक हाथ में लेकर माला फेरते है, लेकिन उनका मन नहीं बदलता अर्थात् उनका मन सत्य और प्रेम की ओर नहीं जाता| ऐसे व्यक्तियों को माला छोड़कर अपने मन को बदलना चाहिए और सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए|

 “भगवान् के स्मरण के लिए अलग से वक़्त निकालने की क्या आवश्यकता है।”

वह व्यक्ति बोला-

‘मैं आपकी बात समझा नहीं।’

तभी वहाँ से एक औरत निकली जो सर पर पानी की गागर लिये चली जा रही थी।  कबीर उस व्यक्ति को लेकर बाहर आ गये और बोले- तुम उस औरत को देखो। 

उस व्यक्ति ने देखा-

‘उसके चेहरे पर प्रसन्नता और उसकी चाल में रफ़्तार थी। उमंग से भरी हुई वह नाचती गाती हुई सी चली आ रही थी। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह से संभली हुई थी।’

संत कबीर ने उस व्यक्ति से कहा- वह नारी जरुर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद उसका कोई प्रियजन घर आया होगा, वह प्यासा उसके लिए वह पानी लेकर जा रही होगी।

मैं तुमसे यह जानना चाहता हूँ कि उसे गागर की याद होगी या नहीं ?

उस व्यक्ति ने जबाब दिया –

‘अगर उसे गागर की याद नहीं होती तो अब तक तो उसकी गागर नीचे गिर गई होती।’

तब संत कबीर बोले-

यह औरत सिर पर  गागर रखकर मज़े से गीत गाती जा रही है, फिर भी गागर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है, तो क्या मैं कपड़े बुनते हुए परमात्मा का स्मरण नहीं कर सकता। परमात्मा के स्मरण के लिए क्या मुझे अलग से वक़्त निकलने की जरुरत है।

मेरी आत्मा तो हमेशा परमात्मा का स्मरण करती रहती है। मेरा शरीर जरुर कपड़ा बुनने के काम में लगा हुआ है, मगर मेरी आत्मा हमेशा प्रभु चिंतन में डूबी रहती है।  इसलिए मेरा मन हमेशा प्रसन्न रहता है।  मैं अपना काम भी ध्यान से कर पाता हूँ क्यों कि मेरा ध्यान कहीं और नहीं जाता। मेरे दोनों हाथ आन्दमय होकर कपड़ा बुनते रहते हैं।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि हम जब चाहे परमात्मा का स्मरण कर सकते हैं। परमात्मा के स्मरण में किया गया काम हमें प्रसन्नता प्रदान करता है

 

ये भी जरुर पढ़ें

काम कने के लिए समर्पण का भाव ज़रूरी है

ईमानदारी का फल

खुद कमाए गए पैसों की कीमत 

अपना भाग्य खुद बदलें 

 

 

DoLafz की नयी पोस्ट ईमेल में प्राप्त करने के लिए Sign Up करें

Trackbacks

  1. […] कबीरदास जी का ईश्वरीय स्मरण […]

  2. […] कबीरदास जी का ईश्वरीय स्मरण […]

  3. […] कबीरदास जी का ईश्वरीय स्मरण […]

  4. […] कबीरदास जी का ईश्वरीय स्मरण […]

Speak Your Mind

*