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कृष्ण और सुदामा की मित्रता Moral Hindi story of Friendship

कृष्ण और सुदामा की मित्रता

Moral Hindi story of Friendship

कृष्ण और सुदामा की मित्रता Moral Hindi story of Friendship

कृष्ण और सुदामा की मित्रता Moral Hindi story of Friendship

कृष्ण और सुदामा के बीच बहुत घनिष्ट मित्रता थी। वे दोनों हर काम साथ में किया करते थे। चाहे

वह गोपियों की जल से भरी मटकी फोड़ना हो या माखन चुराना हो। दोनों बड़े हुये सब अपने

अपने काम में व्यस्त हो गये।

 

यहाँ एक ओर कृष्ण तो मथुरा के नरेश की गद्दी पर बैठ गये और दूसरी ओर सुदामा अपनी आर्थिक 

तंगी से जूझते रहे और भिक्षा मांग कर अपने परिवार का पालन पोषण करते रहे। सुदामा प्रायः अपनी

पत्नी को श्री कृष्ण और सुदामजी के बचपन के किस्से सुनाया करते थे।

 

श्री कृष्ण तो देवता की तरह मथुरा में पूजे जाते थे। सब उनको जानते थे । सुदामा की परेशानियाँ दिन

प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। जब वह दिन में भिक्षा मांगते थे। तब संध्या में उनके यहाँ भोजन बनता था।

कभी-कभी तो बच्चे रात में पानी पीकर भूखे ही सो जाते थे।

 

सुदामा की पत्नी अक्सर सुदामा जी से कहा करती थी, कि जाकर आप अपने मित्र कृष्ण से कोई मदद

क्यों नहीं मांगते तो सुदामा जी हमेशा उनको मना कर देते थे। एक दिन ऐसा आया उस दिन वे

कृष्ण के पास जाने को तैयार हो गये।

 

मित्र का उपहार  

उन्होंने अपनी पोटली में कुछ भुने हुये चावल लिये और अपने मित्र के पास जाने के लिये निकल पड़े

जब वह कृष्ण के महल के पास पहुंचे तो वहां खड़े दरबान से उन्होंने कहा भैया मुझे कृष्ण से मिलना

है। मै उनका मित्र हूँ ।

 

दरबान को सुदामा की वेशभूषा को देखकर लगा कि वह झूठ बोल रहा है तो उन्होंने कृष्ण जी को कोई

सूचना नहीं दी। वह कुछ देर वहां बैठे रहे और कुछ देर में उन्होंने फिर से कहा कि क्या आप मेरा सन्देश

श्री कृष्ण तक पहुंचा सकते है क्या ? कि उनका मित्र सुदामा उनसे भेट करने आया है।

 

तब दरबान अंदर गया और उसने श्री कृष्ण को सुदामा के बारे में बताया और जैसे ही कृष्ण  जी ने

सुदामा का नाम सुना तो वे बिना पादुका पहने ही ख़ुशी से उनसे मिलने को दौड़ पड़े। तो दरबान

देखकर दंग रह गया कि उससे गलती हो गयी जो उसने सुदामा को इतना इंतज़ार कराया।

 

श्री कृष्ण ने जैसे ही सुदामा को देखा तो उनको अपने गले से लगा लिया और कहा मित्र आज

आत्मा धन्य हो गयी। इतने दिनों बाद तुम्हारे दर्शन पाकर, सुदामा जी भी उनके प्यार भरे शब्दों को

सुनकर गदगद हो उठे। उनकी आँखों से आंसू आ गये।

 

सुदामा जी मन में सोचने लगे इतना प्यार तो केवल मुझे मेरा मित्र ही दे सकता है। कृष्ण जी

सुदामा को अंदर लेकर गये। उनका खूब सत्कार किया। फिर सुदामा ने अपनी झोली से वो चावल

निकाले।

 

संकोचवश उन्हें फिर अंदर रख लिया कि इतने बड़े साम्राज्य के मालिक के लिये यह तो एक तुच्छ

भेंट है पर भगवान कृष्ण  ने यह देख लिया और अपने मित्र से कहा – मेरे लिये  इतने स्नेह से जो लाये

हो वो मुझे देते क्यों नहीं, उस उपहार पर मेरा हक़ है। कृपा करके मुझे मेरा उपहार दे दो।

 

तब सुदामा ने चावल निकाले और अपने मित्र को दे दिये श्री कृष्ण अपना उपहार पाकर बड़े खुश

हुये। महल में उन्होंने सुदामा के सम्मान में कोई भी कमी न छोड़ी, उनके आने की ख़ुशी में कई तरह

के भोजन बनबाये और उनको प्रेमपूर्वक खिलाया।

 

मित्र का प्रेम

सुदामा जी दो चार दिन वहां रहे फिर बोले अब मैं अपने घर को जाऊंगा तो कृष्ण जी बोले मित्र कुछ दिन

और रुक जाते। इतनी जल्दी क्यों जा रहे हो क्या मुझसे कोई गलती हो गयी है ? तब सुदामा ने बड़े प्रेम से

अपने मित्र से कहा नहीं मित्र ऐसा नहीं है। मैं फिर कभी भी चला आऊंगा तुमसे मिलने।

 

सुदामा जी जाने लगे। उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में कृष्ण को कुछ न कहा

और वह जाने लगे तो कृष्ण ने सम्मान आदर के साथ उनकी विदाई की। अब सुदामा जब वहां

से निकल गये तो वे सोचने लगे कि घर जाकर वे अपनी पत्नी से क्या कहेंगे।

 

फिर वे जैसे ही अपने घर के नज़दीक पहुँचने लगे तो उन्होंने देखा कि उस जगह पर कोई कुटिया ही

नहीं है। आसपास उन्होंने अपनी पत्नी  बच्चों को भी देखा पर कोई नज़र नहीं आया। अब सुदामा परेशान

हो गये कि मेरा परिवार कहाँ है इतने में ही उनकी पत्नी  ने महल के झरोंखे से सुदामा को देख लिया।

 

उनकी पत्नी  ने तुरंत अपने पुत्र को भेजा क्यों कि वह जानती थी ऐसे सुदामा जी अंदर नहीं आयेंगे और खुद

झरोखे पर खड़ी हो गयी तब पुत्र ने पिता को महल में आने के लिये कहा तो वे अंदर गये। वहां उनकी पत्नी  ने

उनके जाने के बाद का सारा वृतांत अपने पति को सुनाया। वह समझ गये ये कृष्ण की कृपा है।

 

तो सुदामा जी की आँखों में से आंसू झलक आये। उन्होंने सोचा मेरे कुछ न कहने पर भीं मेरे मित्र ने मेरे मन की

बात को पढ़ लिया। भला ऐसा मित्र किसका हो सकता है। मैं तो ऐसे मित्र को पाकर धन्य हो गया हूँ।

 

श्री कृष्ण  ने अपनी मित्रता का सुदामा को ऐसा परिचय दिया कि आज भी दुनियां उनकी मित्रता के

किस्से सुनाती है।

 

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